Wednesday, 3 April 2013

संवेदनाये

आज के इंसान की संवेदना
ना जाने कहाँ मर गयी
क्या हो गया हैं इंसान को
क्यूँ धन-दौलत की चाह में
अपनी संवेदनाओ को मार रहा हैं
जो कल तक हर किसी के सुख दुःख में
पूरी आत्मीयता से शामिल होता था
आज वही इंसान किसी को तडपता देख
उसकी और से मुह फेर रहा हैं
क्या वो इंसानियत को भूल गया हैं
क्या उसकी संवेदनाये रसातल में चली गयी
क्यूँ विमुख हो रहा हैं अपनी इंसानियत से
कहाँ खो गया उसका प्यारभरा अंतर्मन
क्यूँ मानवता को भूल हैवानियत अपना रहा हैं
हे ईश्वर की अनमोल की रचना अपना मन टटोल
जागृत कर अपनी सोयी संवेदनाये
मानव को मानव समझ छोड़ हैवानियत
कर परोपकार होगा तेरा मानव जाती पर उपकार

उसकी चाहत

उसकी चाहत
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चाहत मेरी
परवान चढ़ती रही
उसको पाने की तमन्ना
दिल में बढती रही
वो जितने पास हैं
मेरे दिल के
जिन्दगी से
उतने ही दूर हैं
उनकी ये दूरी
मेरी जान की दुश्मन
बन गयी
हर पल हर लम्हा
बस उसका ही
ख़याल रहता हैं
अब मुझे
होश कहाँ रहता हैं
खोया रहता हूँ
उसकी ही यादो में
उसकी ही बातो में
दुनिया से जैसे मेरा
नाता टूट गया
मेरी साँसे भी
उसका नाम ले ले
मुझे चिढाती हैं
हर धड़कन
उसकी याद दिलाती हैं
उसकी याद में
ये दिल हो गया शायराना
सुनकर मेरे गीत ग़ज़ल शेरो को
अब लोग मुझे
शायर दिल कहते हैं
ये मेरा दीवानापन कह लो
पागलपन कह लो
उसको मोहब्बत में
मैं खुदा कहता हूँ

नील
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